Mukti bodh
( #Muktibodh_part162 के आगे पढिए.....)
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#MuktiBodh_Part163
हम पढ़ रहे है पुस्तक "मुक्तिबोध"
पेज नंबर 313-314
‘‘पुरी के जगन्नाथ मंदिर में राम सहाय पाण्डेय के पैर को गर्म प्रसाद से
जलने से काशी में बैठे कबीर जी ने बचाया‘‘
◆ पारख के अंग की वाणी नं. 710-725 :-
मनसा वाचा कर्मणा, षटदर्शन खटकंत।
गरीबदास समझे नहीं, भरमे भेष फिरंत।।710।।
सहज मते सतगुरु गये, शाह सिकंदर पास।
गरीबदास आसन दिया, संग तहां रैदास।।711।।
पग ऊपरि जल डारि करि, हो गये खडे कबीर।
गरीबदास पंडा जर्या, तहां पर्या योह नीर।।712।।
जगन्नाथ जगदीश का, जरत बुझाया पंड।
गरीबदास हर हर करत, मिट्या कलप सब दंड।।713।।
शाह सिकंदरकूं कह्या, कहा किया येह ख्याल।
गरीबदास गति को लखै, पंड बचाया ततकाल।।714।।
तुरतही पती लिखाय करि, भेज्या सूत्रा सवार।
गरीबदास पौंहचे तबै, पंथ लगे दशबार।।715।।
जगन्नाथके दर्श करि, दूत पूछि हैं पंड। गरीबदास कैसैं जर्या, कहौ बिथा पग हंड।।716।।
पंडा कहै सु दूतसैं, या बिधि दाझ्या पांय।
गरीबदास अटका फुट्या, बेगही दिया सिराय।।717।।
किन बुझाया मुझि कहौ, सुनि पंडा योह पांव।
गरीबदास साची कहौ, ना कछु और मिलाव।।718।।
पंड कहै सोई साच मानि, सुनौं हो दूत मम बीर।
गरीबदास यहां खडे़ थे, डार्या नीर कबीर।।719।।
कहौ कबीर कहां बसत है, कौंन जिन्हौंकी जाति।
गरीबदास पंडा कहै, ज्यूंकी त्यूंही बात।।720।।
वै कबीर काशी बसैं, जाति जुलहदी तास।
गरीबदास दर्शन करैं, जगन्नाथकै दास।।721।।
नितही आवत जात है, जगन्नाथ दरबार।
गरीबदास उस जुलहदीकूं, पंडा लिया उबार।।722।।
पंडेकूं पतीया लिखी, जो कछु हुई निदान।
गरीबदास बीती कही, लिखि भेज्या फुरमान।।723।।
आये काशी नगर में, दूत कही सत गल।
गरीबदास इस जुलहदीकी, बड़ी मजल जाजुल।।724।।
शाह सिकंदर सुनि थके, याह अचरज अधिकार।
गरीबदास उस जुलहदीका, नित करि हैं दीदार।।725।।
◆ सरलार्थ :- एक दिन शाम के समय परमेश्वर कबीर जी अपने साथ संत रविदास जी को लेकर राजा बीरदेव सिंह बघेल के दरबार में गए। उस दिन दिल्ली के सम्राट सिकंदर लोधी भी वहाँ आए हुए थे। सिकंदर लोधी पूरे भारत का शासक था, वह महाराजा था। काशी नरेश बीरदेव सिंह बघेल छोटे राजा थे जो दिल्ली के बादशाह के आधीन होते थे। दोनों संतों को बैठने के लिए आसन दिया गया। कुछ देर दोनों राजाओं के साथ परमात्मा की चर्चा की। फिर अचानक शीघ्रता से कबीर परमेश्वर जी ने खड़ा होकर अपने लोटे का जल अपने पैर के ऊपर डालना प्रारम्भ कर दिया। सिकंदर ने पूछा प्रभु! यह क्या किया अपने पैर के ऊपर पानी डाला, इसका कारण बताईये। कबीर जी ने कहा कि पुरी में जगन्नाथ के मन्दिर में एक रामसहाय नाम का पाण्डा पुजारी है। वह भगवान का खिचड़ी प्रसाद बना रहा था। उसको उतारने लगा तो अति गर्म खिचड़ी उसके पैर के ऊपर गिर गई। वह चिल्लाकर अचेत हो गया था। यह बर्फ जैसा जल उसके जले हुए पैर पर डाला है, उसके जीवन की रक्षा की है अन्यथा वह मर जाता। जगन्नाथ जी का मंदिर उड़ीसा प्रान्त में पुरी शहर में है जो बनारस से लगभग एक हजार किलोमीटर दूर है। यह बात राजा सिकंदर तथा बीरदेव सिंह बघेल के गले नहीं उतरी। कबीर जी को बताए बिना उसकी जाँच करने के आदेश दे
दिए। दो सैनिक ऊँटों (camels) पर सवार होकर पुरी में गए। 10 दिन जाने में लगे। पुरी में जाकर पूछा कि रामसहाय पाण्डा कौन है? उसको बुलाया गया। सिपाहियों ने पूछा कि
क्या आपका पैर खिचड़ी से जला था? उत्तर मिला-हाँ। प्रश्न किया कि किसने ठीक किया? उत्तर मिला कि कबीर जी यहाँ पास ही खड़े थे, उन्होंने करमण्डल से हिमजल डाला था।
उससे मेरी जलन बंद हो गई। यदि वे जल नहीं डालते तो मेरी छुट्टी हो गई थी, मैं अचेत हो गया था। प्रश्न-क्या समय था? शाम के समय सूर्य अस्त से लगभग एक घण्टा पहले। अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने भी साक्ष्य दिया। सिपाहियों ने कहा सब लिखकर दस्तखत-अंगूठे लगाओ। रामसहाय पाण्डे ने तथा वहाँ के अन्य पुजारियों ने बताया कि कबीर जी तो नित्य-प्रतिदिन मन्दिर में आते हैं। सर्व प्रमाण लेकर-सुनकर दोनों सिपाही वापिस आए और सच्चाई बताई। दोनों राजा कबीर जी की कुटिया पर गए। दण्डवत प्रणाम किया तथा अपने
अविश्वास रूपी अपराध की क्षमा माँगी। बताया कि आप सत्य कह रहे थे। आप जी ने ही जगन्नाथ मंदिर के रामसहाय पाण्डे के पैर को जलने से बचाया था। हमने अपनी तसल्ली
के लिए दो सैनिक भेजकर पता कराया है। आप स्वयं वह खुदा हो जो सातवें आसमान पर बैठा है। आप नर रूप धारण करके पृथ्वी पर लीला करने आए हो। परमेश्वर कबीर जी ने कहा महाराज! आपको यहाँ भी गलती लगी है। मैं तो अल्लाहु अकबर हूँ। मैं करोड़ों
आसमानों के पार सत्यलोक (सतलोक) में तख्त पर विराजमान हूँ। यहाँ मैं आपके सामने खड़ा हूँ। मैं पैगम्बर मुहम्मद को भी मिला था। उन्होंने भी मुझे पहचानने में भूल की थी।
(ब्रह्मबेदी अंग में लिखा है :- ‘‘पाण्डा पाँव बुझाया सतगुरू, जगन्नाथ की बात है।‘‘)
क्रमशः______________
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